महाराणा प्रताप: महान योद्धा

महाराणा प्रताप: एक ऐसा सम्राट जिसने जंगलों में रहना पसंद किया लेकिन कभी विदेशी मुगलों की दासता स्वीकार नहीं की।



भारत के वीर सपूतों में से एक महाराणा प्रताप मेवाड़ के महान हिंदू राजपूत शासक थे. सोलहवीं शताब्दी के राजपूत शासकों में महाराणा प्रताप ऐसे शासक थे, जो अकबर को लगातार टक्कर देते रहे. लेकिन कभी मुग़ल का परधीनता स्वीकार नहीं किया। उनका निधन 29 जनवरी, 1597 में हुआ था। महाराणा प्रताप के बारे में सभी लोग जानते हैं। बहुत से लोग इन्हें मेवाड़ी राणा सम्राट भी कहते हैं और उन्हें राजपूतों का गौरव भी कहते हैं, महाराणा प्रताप को राजपूत वीरता, शिष्टता और दृढ़ता की एक मिसाल माना जाता है। दुशमनों के सामने सिर्फ महाराणा प्रताप का नाम लेने भर से दुश्मन सेना के हाथ पाव फूल जाते थे और पसीने छूट जाते थे। एक ऐसा राजा जो विषम से विषम परिस्थिति में किसी के आगे झुका नहीं। महाराणा प्रताप को जितना उनकी बहादुरी और वीरता के लिए जाना जाता है, उतनी ही उनकी दरियादिली और प्रजा व राज्य से उनका प्रेम जगजाहिर है। बताते हैं कि प्रताप कभी भी निहत्थे दुश्मनों पर वार नहीं करते थे और दुश्मनों के लिए भी एक तलवार हमेशा अपने पास रखते थे। महाराणा प्रताप पर बहुत सी फिल्में और धारावाहिक बनें। कई शोध हुए और उनपर किताबें भी लिखी गई। आज भी प्रताप की गौरवगाथा बच्चों को पढ़ाई जाती है। ताकि हमारे देश के आने वाले भावीपीढ़ी भी महाराणा प्रताप के तरह ही वीर, साहसी और देशभक्त बने।

महाराणा प्रताप मेवाड़ के महान हिंदू शासक थे। वे उदयपुर, मेवाड़ में सिसोदिया राजवंश के राजा थे। वे अकेले ऐसे वीर थे, जिसने मुग़ल बादशाह अकबर की अधीनता किसी भी प्रकार स्वीकार नहीं की। वे हिन्दू कुल के गौरव को सुरक्षित रखने में सदा तल्लीन रहे। वीरता और आजादी तो राणा के खून में समाया था क्योंकि वह राणा सांगा के पोते और उदय सिंह के पुत्र थे। राजस्थान के मध्यकालीन इतिहास का सबसे चर्चित युद्ध हल्दीघाटी का युद्ध था जो मुगल बादशाह अकबर और महराणा प्रताप के बीच हुआ था।ऐसा माना जाता है कि हल्दीघाटी के युद्ध में न तो अकबर की सेना ने जीता और न ही राणा हारे. मुगलों के पास सैन्य शक्ति अधिक थी तो महाराणा प्रताप के पास वीरों की कोई कमी नहीं थी, जो मां भारती के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने के लिए हमेशा तैयार थे। इसका परिणाम भी यही हुआ, युद्ध वीरता और साहस से की जाती है ना कि संख्या बल से। आपको बता दें हल्दी घाटी के युद्ध में महाराणा प्रताप के पास सिर्फ 20000 सैनिक थे और अकबर के पास 85000 सैनिक थे। इसके बावजूद महाराणा प्रताप ने हार नहीं मानी और स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करते रहे. बताते हैं लोग महाभारत के युद्ध के बाद हल्दीघाटी की युद्ध सबसे विनाशकारी युद्ध में से एक था। जो अकबर की सेना और महाराणा प्रताप के बीच हुआ था। कहते हैं 1 दिन में 17000 सैनिकों की मौत हुआ था। हल्दीघाटी की धरती जो हल्दी की तरह पीला था व रक्त से लाल हो गया था। 

महाराणा प्रताप का भाला 81 किलो वजन का था और उनके छाती का कवच 72 किलो का था. उनके भाला, कवच, ढाल और साथ में दो तलवारों का वजन मिलाकर 208 किलो था। कहते हैं महाराणा प्रताप के तलवार में इतना ताकत था। कि एक ही वार में घोड़े के भी दो टुकड़े कर देते थे। महाराणा प्रताप का सबसे प्रिय घोड़ा चेतक था. महाराणा प्रताप की तरह ही उनका घोड़ा चेतक भी काफी बहादुर था.हल्दीघाटी की लड़ाई में उनका वफादार घोड़ा चेतक गंभीर रूप से जख्मी होने की वजह से मारा गया. 

अकबर के लाख प्रयासों के बाद भी महाराणा प्रताप ने कभी विदेशी मुगलों की अधीनता स्वीकार नहीं किया। लेकिन इसके बावजूद जब अकबर को महाराणा प्रताप की मृत्यु की खबर मिली तो वो बिल्कुल मौन हो गया था और उसकी आँखों मे आंसू आ गए थे। वह महाराणा प्रताप के गुणों की दिल से प्रशंसा करता था।


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